समुद्री खाद्य निर्यात बढ़ाने पर राष्ट्रीय कार्यशाला, मूल्यवर्धन, स्थिरता और बाजार पहुंच पर जोर

नई दिल्ली। समुद्री खाद्य निर्यात क्षेत्र को नई गति देने के उद्देश्य से आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में मूल्यवर्धन, स्थिरता, निर्यात अवसंरचना और वैश्विक बाजारों तक पहुंच बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। कार्यशाला में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि पिछले एक दशक में भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और देश का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 30 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाना है।
कार्यशाला को संबोधित करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि समुद्री खाद्य क्षेत्र भारत की निर्यात अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। उन्होंने बताया कि पिछले दस वर्षों में समुद्री उत्पादों के निर्यात में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र की बढ़ती क्षमता और वैश्विक मांग को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य समुद्री खाद्य निर्यात को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना और भारत को वैश्विक समुद्री खाद्य बाजार में और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है।
कार्यशाला में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) ढांचे, कोल्ड चेन अवसंरचना और समुद्री खाद्य क्षेत्र में निर्यात के नए अवसरों पर व्यापक चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने कहा कि बेहतर भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन सुविधाएं समुद्री उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने और निर्यात बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। प्रतिभागियों ने निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीकों और मूल्यवर्धित उत्पादों के विकास की आवश्यकता पर भी बल दिया।
कार्यशाला में स्टार्टअप और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रोत्साहित करने के उपायों पर भी विचार-विमर्श किया गया। चर्चा का केंद्र भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों के लिए नए बाजारों तक पहुंच आसान बनाना और छोटे उद्यमों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ना रहा। विशेषज्ञों ने कहा कि नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देकर समुद्री खाद्य क्षेत्र में रोजगार और निर्यात दोनों को बढ़ाया जा सकता है।
कार्यशाला में भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) के भीतर मौजूद उच्च मूल्य वाले गहरे समुद्री संसाधनों की अप्रयुक्त क्षमता के उपयोग पर भी चर्चा हुई। विशेष रूप से अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों के बेहतर दोहन की संभावनाओं पर विचार किया गया। इसके अलावा समुद्री शैवाल उत्पादन, सजावटी मत्स्य पालन, ठंडे पानी की मत्स्य पालन गतिविधियां और ट्राउट पालन जैसे उभरते क्षेत्रों को भी भविष्य की विकास संभावनाओं के रूप में रेखांकित किया गया।
कार्यशाला का समापन सभी हितधारकों की इस साझा प्रतिबद्धता के साथ हुआ कि समुद्री खाद्य क्षेत्र में स्थिरता, ट्रेसबिलिटी, मूल्यवर्धन, निर्यात अवसंरचना और बाजार पहुंच को मजबूत किया जाएगा। साथ ही नवाचार, उद्यमिता और उत्पाद विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए मिलकर काम किया जाएगा। प्रतिभागियों का मानना है कि कार्यशाला से प्राप्त सुझाव और सिफारिशें समुद्री खाद्य निर्यात में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने तथा ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार करने में सहायक सिद्ध होंगी।