12.40 लाख जूतों की खरीदी में गड़बड़ी उजागर, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने टेंडर किया निरस्त

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने तेंदूपत्ता संग्राहकों को बांटे जाने वाले 12.40 लाख जोड़ी पुरुषों के कैनवास जूतों की सरकारी खरीदी के टेंडर को रद्द कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने माना कि टेंडर में जानबूझकर ऐसी शर्तें जोड़ी गई थी, जो ‘कैनवास जूतों’ के बजाय ‘इंडस्ट्रियल सेफ्टी जूतों’ के लिए होती हैं, ताकि कुछ चुनिंदा बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचा जा सके और छोटे उद्योगों को प्रतिस्पर्धा से बाहर किया जा सके। दिल्ली की ‘मैसर्स चरणपादुका इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड’ ने याचिका दायर कर टेंडर की शर्तों को चुनौती दी थी।
पढ़िए क्या है मामला?
छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज व्यापार एवं विकास सहकारी संघ मर्यादित ने 4 जून 2026 को ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ जेम पोर्टल के माध्यम से टेंडर जारी किया था। इसके तहत राज्य के तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए 12.40 लाख जोड़ी ‘कैजुअल कैनवास वाकिंग शूज’ खरीदे जाने थे।
MSME Act एमएसएमई एक्ट के तहत एक पंजीकृत माइक्रो उद्योग जूता निर्माता कंपनी ‘चरणपादुका इंडस्ट्रीज’ ने टेंडर की अतिरिक्त नियम व शर्तों को छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रेम गर्ग और डायना बजरंग ने डिवीजन बेंच के समक्ष दलील देते हुए कहा, टेंडर की शर्तें पूरी तरह से मनमानी, अतार्किक और भेदभावपूर्ण हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और 19 (1) (जी) व्यापार की स्वतंत्रता का सीधे तौर पर उल्लंघन करती है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने किया खुलासा
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने हाई कोर्ट के समक्ष वनोपज संघ की बड़ी गड़बड़ियों और मनमानी शर्तों का पर्दाफाश करते हुए बताया कि आम कैनवास के जूते खरीदे जाने थे, लेकिन टेंडर में ‘ब्यूरो आफ इंडियन स्टैंडर्ड’ का वह कड़ा मापदंड अनिवार्य कर दिया गया जो फैक्ट्रियों में पहने जाने वाले ‘लोहे के टो वाले भारी सेफ्टी बूट’ के लिए होता है।
टेंडर की शर्तों में की गई चालाकियों की ओर खींचा ध्यान
वर्ष 2024 के पिछले टेंडर में इसी खरीदी के लिए ‘वाकिंग शूज (क्यू3)’ कैटेगरी चुनी गई थी, लेकिन इस बार इसे बदलकर ‘सेफ्टी फुटवियर (क्यू2)’ कर दिया गया। इस वजह से कोई भी आम कैनवास जूता निर्माता कंपनी जेम पोर्टल पर अपना आनलाइन बिड सबमिट ही नहीं कर पा रही थी, क्योंकि पोर्टल उसे ‘सेफ्टी शू’ की श्रेणी में अयोग्य दिखा रहा था। टेंडर में प्री-बिड मीटिंग की कोई व्यवस्था नहीं रखी गई ताकि कोई आपत्ति न उठा सके। इसके अलावा टर्नओवर, पिछले अनुभव, सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट और चार पीयू मोल्डिंग मशीनों के मालिकाना हक जैसी ऐसी शर्तें जोड़ी गईं जिससे देश के छोटे और मध्यम उद्योग एमएमएमई इस रेस से पूरी तरह बाहर हो जाए।
वनोपज संघ ने कहा, बेहतर क्वालिटी के लिए कड़े नियम जरूरी
वनोपज संघ की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सैयद माजिद अली और राज्य सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने टेंडर का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि इतनी बड़ी मात्रा में और समय-सीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण जूतों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तकनीकी रूप से सक्षम और आर्थिक रूप से मजबूत बड़ी कंपनियों का चयन जरूरी था। चूंकि जेम पोर्टल पर ‘कैजुअल कैनवास शूज’ की कोई सटीक श्रेणी नहीं थी, इसलिए आपरेशनल सहूलियत के लिए सबसे नजदीकी श्रेणी को चुना गया था।
हाई कोर्ट ने टेंडर की शर्तों को ठहराया दोषपूर्ण और मनमाना
डिवीजन बेंच ने वनोपज संघ के अधिवक्ता से पूछा, पिछले टेंडर की तुलना में इस बार नियमों को अचानक इतना कड़ा और संदेहास्पद क्यों किया गया, तो संघ की ओर से कोई संतोषजनक या तार्किक जवाब नहीं दे सके। संघ ने कोर्ट में इस संबंध में कोई लिखित जवाब दाखिल करने से भी इंकार कर दिया। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, पिछले समान टेंडर की तुलना में इस निविदा में जोड़ी गई शर्तों के पीछे कोई तार्किक आधार या आनुपातिक आवश्यकता साबित नहीं की जा सकी है। टेंडर की ये शर्तें पूरी तरह से मनमानी हैं, जो निष्पक्ष प्रतियोगिता को रोकती हैं। जूतों के प्रकार और जेम पोर्टल की कैटेगरी में जानबूझकर विसंगति पैदा की गई है, जिससे योग्य निर्माता टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित हो रहे हैं।
टेंडर की शर्तों को हाई कोर्ट ने किया निरस्त, नए सिरे से टेंडर जारी करने दिया आदेश
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 4 जून 2026 के मूल बिड डॉक्यूमेंट और उसकी सभी एडिशनल शर्तों को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। डिवीजन बेंच ने वनोपज संघ और राज्य सरकार को निर्देश दिया है, सार्वजनिक खरीद के स्थापित सिद्धांतों और वैधानिक नियमों का पालन करते हुए, पूरी पारदर्शिता के साथ नए सिरे से निविदा जारी करें। कोर्ट ने अधिकारियों को इस आदेश की तत्काल तामीली सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।